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Aug 24, 2013

Sushil Kumar and Yogeshawar Dutt's Akhara, Chhatrasal Stadium

By Deepak Ansuia Prasad









छत्रसाल अखाड़ा
जब सुशील कुमार ओलम्पिक पोडियम पर खड़े हुए तो पूरा देश उनके लिए तालियाँ बजा रहा था. छत्रसाल अखाड़े के इस पहलवान का इंटरव्यू और उसके बाद कई मीडिया शो हफ़्तों तक देश भर के हर मीडिया माध्यमों पर छाये रहे. डी टी सी बस के ड्राईवर के इस पुत्र सुशील कुमार, और योगेश्वर दत्त , अमित , जैसे पहलवानों ने हिन्दुस्तान में कुश्ती के इतिहास को पलट कर रख दिया है. और देश भर के पहलवान उनका अनुसरण कर रहे हैं. अब किसी भी स्तर , चाहे एशियाई खेल हों, ओलम्पिक, या राष्ट्रिय खेल , मैडल लेना एक सुनहरा और जल्द साकार होने वाला स्वप्न हो गया है , जिसे आज हजारों पहलवान देख रहे हैं. देश के दूर दराज के गाँवों में भी अखाड़ों में बच्चों के संख्या बढ़ गई है , कोच और गुरु एक नये जोश से बच्चों को तैयार करने में लग गए हैं. महिलायें भी पीछे नहीं है, सुशील की इस कामयाबी को उन्होंने एक सोच की तरह अपना लिया की वो भी मैडल ला सकती हैं, नतीजतन हरयाणा के एक गाँव की लड़की गीता ओलम्पिक तक का सफ़र कर आई है. इसी प्रकार दिव्या सैन ,जो की एक गरीब परिवार से है जिसके पिता लंगोटी और जांघिया सीकर परिवार पाल रहे हैं , अपने महिला कुश्ती दल के साथ हाल ही में मंगोलिया का सफ़र कर लौटी हैं , वो भी महिला चैंपियनशिप लेकर। आज पहलवानों की आँखों में वही सपने दिखाई देते हैं जो सुशील और योगेश्वर की आँखों में ओलम्पिक खेलों में जाते समय थे. और वो दिन दूर नहीं होगा जब ओलम्पिक में एक नहीं अनेकों गोल्ड मैडल भारत की झोली में आयेंगे।

छत्रसाल स्टेडियम आमतौर पर पहलवानों के बीच महाबली सतपाल अखाड़े के नाम से जाना जाता हैं , देश की कुश्ती की दशा और दिशा बदलने वाले इन पहलवानों ने कुश्ती की शिक्षा यही , गुरु सतपाल,जसबीर, और रामफल जैसे दृढ निश्चयी गुरुओं से ली है. मुझे गुरु सतपाल और रामफल जी ने अखाडा देखने और कवरेज के लिए आज्ञा प्रदान की उसका शुक्रिया। यहीं महज 14 साल की उम्र में सुशील पहलवान ने कुश्ती की शिक्षा आरंभ की थी. स्टेडियम महाराज छत्रसाल के नाम पर है जिनके घोड़े पर बैठी तलवार पकडे रौद्र भंगिमा लिए मूर्ती प्रवेश द्वार पर ही है. बाएं हाथ पर बाल पहलवानों के लिए मैट हाल और हॉस्टल है , जबकि सीनियर पहलवानों के लिए स्टेडियम की पार्किंग में मैट और मिटटी के अखाड़े की व्यवस्था है. अखाड़े में रस्सी, जिम, और वेट ट्रेनिंग की व्यवस्था है. हालाँकि मेडिकल सुविधाएं नदारद है। 300 से ऊपर पहलवान सुबह सवेरे उठकर वर्जिश और जोर चालू कर देते हैं जिन्हें गुरु जन अपनी देख रेख में ही संपन्न कराते हैं. पहलवानों के जोर, वर्जिश , प्रैक्टिस , खेल कूद, व्यवहार , खाने पीने और अनुशाशन पर विशेष ध्यान दिया जाता है.

सभी पहलवानों को यहाँ सिखाना असंभव है , इसलिए हम केवल ट्रायल के आधार पर श्रेष्ठ खिलाडियों को ही यहाँ सीखने के लिए अनुमति देते हैं गुरु रामफल ने बताया।

वर्ष 2000 में बने इस खेल परिसर को , 2010 कॉमन वेल्थ खेलों के समय में दुबारा संवारा गया. आज यहाँ पर बेहतर ट्रेक ,एंड फील्ड , सोना रूम, स्टीम बात, आधुनिक चेंजिंग रूम्स,टॉयलेट्स , स्विमिंग , बास्केटबाल, वॉली बाल , हैण्ड बाल कोर्ट्स , एयर कंडिशन्ड रूम्स, हॉस्टल , किचन सुविधाएं हैं. पूरी तरह कवर्ड दर्शक दीर्घ में 16000 दर्शकों के बैठने की व्यवस्था है. कुश्ती के अलावा कबड्डी, खो खो , हॉकी , स्विमिंग, बास्केट बल, वॉली बल, टेबल टेनिस, लॉन टेनिस जैसे खेल यहाँ खेले जाते हैं. आजादपुर मेट्रो स्टेशन से मात्र कुछ कदमो की दूरी इस खेल परिसर को सुगम बनाती है.

महाबली सतपाल अपने आप में देश के सर्वोच्च पहलवान रहे हैं , उनके समय में विश्व के सभी देश आधुनिक कुश्तियों के अपना रहे थे , हिन्दुस्तान में मैट की सुविधाएँ बिलकुल न थी. ओलंपिक के क्वार्टर फाइनल में वह बहुत कम मार्जिन से हारे , लेकिन कामनवेल्थ में ब्रोंज और एशियाई गेम्स में उन्होंने स्वर्ण जीता। उन्हें अर्जुन , पदम् श्री और द्रोणाचार्य जैसे पुरस्कारों से भी सम्मानित किया जा चूका है है. इसी प्रकार कोच जसवीर , और रामफल भी द्रोणाचार्य गुरु हैं. प्रतिदिन पहलवानों के अभ्यास के लिए उनकी टीम मौजूद रहती हैं और पहलवानों को कुश्ती कला में निपुण बना रही है.


गुरु रामफल को अखाडा देखने की आज्ञा प्रदान करने के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा की मीडिया कर्मी भी कुश्ती की परंपरा को देश दुनिया तक पहुंचाने के लिए धन्यवाद के पात्र हैं.


ENGLISH VERSION






Sushil Kumar, the son of a bus driver, changed the course of Indian wrestling. When he stood on the Olympic podium, the whole country cheered for him. He became the pride of India and thrust the sport of wrestling into the news once again. Young kids with Olympic dreams poured into their local akharas and even women started getting involved in freestyle wrestling.

Delhi’s Chhatrasal Stadium, popularly known as the Mahabali Satpal Akhada, is the training ground where Sushil Kumar began his quest for Olympic glory. The 66kg wrestler first captured nationwide and global attention when he bagged a bronze medal at the 2008 Olympic Games. From there he went on to win a gold medal at the 2010 World Championship and then a silver medal at the 2012 Olympics.

Chhatrasal Stadium is one of the most successful akhadas in India, turning out some of the greatest legends of modern Indian wrestling. Along with Sushil Kumar, Chhatrasal Stadium is also the home of Yogeshwar Dutt, a Padma Shri awardee who won a bronze medal in the 2012 Olympic Games in the 60kg weight class. He also won gold at the 2012 Asian Wrestling Championship, and another gold at the 2010 Commonwealth Games.

Amit Kumar, the youngest Indian wrestler ever to go to the Olympics, is also a Chhatrasal Stadium wrestler. He most recently brought glory to India by winning a gold medal at this year’s Senior Asian Wrestling Championship. Wrestlers Bajrang, Rajneesh and Rahul Aware are also champions from Chhatrasal.

Another Chhatrasal Stadium who is inspiring even more young wrestlers is Virender Singh, a deaf wrestler known affectionately by his nickname Goonga Pehalwan. Virender just won a gold medal at the Deaflympics in Bulgaria and his amazing story is the subject of a documentary film in the making.

Chhatrasal Stadium akhada runs the same way as it did when Sushil begain his training as a 14 year old boy. The stadium is named after Maharaja Chhatrsal whose statue is seen at the entrance. On the left side there is a freestyle training center with regulation wrestling mats, a small temple of Lord Hanuman, ropes for climbing and some iron structure for workouts, while there is boys’ hostel at the front. Wrestlers begin their daily training very early in the morning with stretching and a run.

Practice for junior wrestlers is at the lower level of the stadium, which houses a mat as well as a traditional dirt pit for Indian-style wrestling. More than 300 students are practicing here now and the number is growing day by day. “It is impossible to teach every student here, however if somebody wants to join, we take a trial an on the basis of which we allow him to practice here,” says Guru Ramphal.

Chhtrsaal stadium was built in 2000, but was renovated for the 2010 Delhi Commonwealth Games. It now has best facilities a stadium can provide, a new track for running, good seating, clean changing rooms with a sauna and steam bath, etc. There is a separate portion for volleyball hand ball and basketball, which wrestlers also play for recreation. Besides kushti, the stadium also host athletics, hockey, volleyball, basketball, badminton, table tennis, handball and kabaddi competitions.

Mahabli Satpal who himself was one of the best wrestlers of India during his wrestling days went to the Olympics in Moscow in 1980 when freestyle wrestling was virtually unknown in India and there wasn’t a single mat in any akhada. He lost the quarterfinals narrowly but won medal in several Commonwealth Games and gold at the Asian Games in 1982. He is also the recipient of Arjuna, Padam Shri, and Dronacharya awards.

I thanked Guru Ramphal for receiving me and he left me with some very kind words: “It is the people like you who deserve the praise for promoting wrestling.”